आज है उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब का जन्मदिन । पढ़िये उनके कुछ चुनिंदा शायरी

Updated by- Aditya Anand//City News Live

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

 

ये पंक्तियां है उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ
ग़ालिब की औऱ आज इस उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर मिर्जा गालिब का जन्मदिन है । फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी इनको दिया जाता है। ग़ालिब और असद के नाम से मशहूर मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। आगरा, दिल्ली और कलकत्ता में अपनी ज़िन्दगी गुजारने वाले ग़ालिब को मुख्यतः उनकी उर्दू ग़ज़लों को लिए याद किया जाता है।तभी तो उन्होंने अपने बारे में स्वयं लिखा था कि दुनिया में यूं तो बहुत से अच्छे कवि-शायर हैं, लेकिन उनकी शैली सबसे निराली है-
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

पेश है मिर्जा गालिब के कुछ चुनिंदा शायरी-

तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूंढ़ते रहे

बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है

तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
नहीं तो दो घूंट पी और मस्जिद को हिलता देख

हम वहां हैं जहां से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

अक़्ल वालों के मुक़द्दर में यह जुनून कहां ग़ालिब
यह इश्क़ वाले हैं, जो हर चीज़ लूटा देते हैं…

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

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