मां बनने के लिए जो कुछ चाहिए, सब था मेरे पास- सिवा एक मर्द के

मेरी उम्र 35 को पहुंच रही थी. मैंने खूब दुनिया देखी थी, डूबकर और टूटकर मुहब्‍बत की थी, लेकिन अब तक जिंदगी में कोई ऐसा पुरुष नहीं आया था, जिसके लिए लगे कि मैं इसके बच्‍चे की मां बनना चाहती हूं या कि इसके साथ जिंदगी बितानी है. शादी का तो पता नहीं, लेकिन मैं मां बनना चाहती थी, हमेशा से. मेरा शरीर सलामत था, कहीं कोई दिक्‍कत नहीं थी. मैं प्राकृ‍तिक तरीके से गर्भधारण कर मां बन सकती थी, लेकिन दिक्‍कत सिर्फ एक ही थी- मेरी जिंदगी में कोई पुरुष नहीं था.

कलकत्‍ता में मेरा एक दोस्‍त था. वो गाइनिकॉलजिस्‍ट था. वो कहता था कि तुम अपने एग फ्रीज करवा लो और दुनिया घूमो. फिर जब तुम्‍हारा दिल करे कि अब तुम बच्‍चे के लिए तैयार हो तो बच्‍चा पैदा कर लेना. प्रकृति ने औरत को नया जीवन रचने की सलाहियत दी है लेकिन ये भी हमेशा एक जैसी नहीं रहती. औरत की बॉडी क्‍लॉक एक समय के बाद धीमी पड़ने लगती है. एग खत्‍म होने लगते हैं. इसलिए तो डॉक्‍टर और बड़े-बूढ़े कहते हैं कि 30 के भीतर बच्‍चा कर लो.

अब मैं 35 की हो रही थी और अब तक न मैं मां बनी थी और न ही मैंने अपने एग फ्रीज करवाए थे. एक दिन मैं डॉक्‍टर के क्लिनिक गई. उन्‍होंने फिर कहा, एग फ्रीज करवा लो. मैंने कहा, नहीं, अब ये नहीं करना, अब मुझे बच्‍चा पैदा करना है, आइवीएफ से. किसी के लिए भी इस फैसले को समझना आसान नहीं था. डॉक्‍टर को लगा कि मैं फितूर में फैसला ले रही हूं. आइवीएफ तकनीक देश में आ रही थी, लेकिन अब तक वो ऐसे शादीशुदा जोड़ों के लिए थी, जिनके किसी कारण बच्‍चे नहीं हो पाते. इसलिए नहीं थी कि अकेली औरत क्लिनिक में जाए और बोले, मुझे मां बनना है. डॉक्‍टर ने कहा, तुम्‍हें पता भी है तुम क्‍या कह रही हो. अचानक से फितूर चढ़े तो आप उठकर फुचका खाने जा सकते हैं, लेकिन आप अचानक से उठकर ये नहीं बोलते कि आपको बच्‍चा पैदा करना है.

मैं तो बस उठी, क्लिनिक में पहुंची और बोला, मुझे बच्‍चा पैदा करना है.

 

ये करना आसान नहीं था. मेरे आसपास कई औरतें थीं, जो सिंगल मदर थीं. लेकिन वो तलाकशुदा या सेपरेटेड थीं. उनके बच्‍चों के पिता थे, उनका एक नाम था, पहचान था. मैं एक ऐसा बच्‍चा पैदा करने जा रही थी, जिसके पिता का कोई नाम, पहचान कुछ नहीं होगा. सोचकर थोड़ा डर भी लगा था.

पहले हमने इन वर्टो यूट्राइन इंसेमिनेशन की कोशिश की. यह आइवीएफ के मुकाबले बहुत आसान प्रक्रिया था, जिसमें पीरियड्स के बाद ओव्‍यूलेशन के समय शरीर पर स्‍पर्म इंजेक्‍ट किए जाते हैं. एक-दो महीने ये कोशिश की गई, लेकिन मैं प्रेग्‍नेंट नहीं हुई. फिर मैंने आइवीएफ कराने का फैसला किया.

बहुत लंबी और तकलीफदेह प्रक्रिया थी. और भी मैरिड कपल थे, जो इन सबसे गुजर रहे थे, लेकिन ये करते हुए वो दो थे, वो साथ थे. मैं बिलकुल अकेली थी. हर बार खुद ड्राइव करके क्लिनिक जाती, इंजेक्‍शन लगवाती, दवाइयां खाती, जांच की प्रक्रिया से गुजरती मैं बिलकुल अकेली थी.

बाहरी दवाइयों और इंजेक्‍शन के जरिए ज्‍यादा अंडाणु पैदा किए गए, फिर उन्‍हें शरीर से निकाला गया, बाहर एक परखनली में स्‍पर्म से मिलाया गया, फिर कई एम्‍ब्रायो (भ्रूण) तैयार हुए और उनमें से एक भ्रूण को मेरे शरीर में डाला गया. अब उस भ्रूण को गर्भाशय में अपना घर बनाना था और आगे एक शिशु का आकार लेना था. यहां तक तो विज्ञान की कारामात थी, लेकिन इसके बाद सबकुछ प्रकृति पर निर्भर था. फिर आप कुछ नहीं कर सकते, सिवाय इंतजार और प्रार्थना के.

कुछ दिन इंतजार के बाद प्रेग्‍नेंसी हो गई. मैं बहुत खुश थी, बहुत प्‍यार से अपना ख्‍याल रख रही थी. फिर एक मैं घर पर अकेली थी. फरवरी का महीना था. अचानक मुझे ब्‍लीडिंग शुरू हो गई. मुझे डॉक्‍टर के पास ले जाने वाला भी कोई नहीं था. मैं खुद ही गाड़ी चलाकर क्लिनिक गई. शरीर से खून बहे जा रहे थे और पेट के निचले भाग में भयानक दर्द. मिसकैरिज के समय बच्‍चे के जन्‍म जैसा ही दर्द होता है. मैं क्लिनिक पहुंची तो होश में नहीं थी. जब होश आया तो मेरा बच्‍चा मुझसे बिछड़ चुका था.

ये फरवरी की बात है. पूरा मार्च गहरे अवसाद में बीता. अप्रैल में मैंने एक नाटक किया. यह नाटक 10 औरतों की कहानी थी. उन औरतों की कहानी, जो जीवन में प्रेम के लिए गहरी पीड़ा से गुजरी, जिन्‍होंने सिर्फ जिंदा रहने के लिए संघर्ष किया. उन औरतों की पीड़ा ने मुझे अपनी पीड़ा से बाहर आने में मदद की. अप्रैल बीता. मई में डॉक्‍टरों ने एक बार फिर कोशिश की और एक नया भ्रूण मेरे शरीर में डाला गया. वह रहा और मेरी देह का हिस्‍सा बन गया. वह मेरे भीतर आकार लेने लगा.

तीन महीने तक मैं पूरी तरह बेडरेस्‍ट पर थी. सिर्फ खाती, किताबें पढ़ती, फिल्‍में देखती और म्‍यूजिक सुनती. मैं और मेरा बच्‍चा, हम सिर्फ मौज कर रहे थे. उस वक्‍त मैं दुनिया की सबसे सुखी स्‍त्री थी.

मैं बयां नहीं कर सकती वो दिन, जिस दिन मेरे बेटे ने पहली बार इस दुनिया में कदम रखा, जब वह पहली बार रोया, जब पहली बार मैंने उसे अपने सीने से लगाया. प्रेग्‍नेंसी को अभी सिर्फ साढ़े सात महीने हुए थे और एक दिन मेरा वॉटर फट गया. मुझे आनन-फानन में अस्‍पताल पहुंचाया गया. डॉक्‍टरों का कहना था कि अगर अभी डिलिवरी की तो बच्‍चे के फेफड़े बहुत कमजोर होंगे. अभी उसे कुछ समय और भीतर रहना जरूरी है. मुझे दवाइयां दी गईं और तीन दिन तक बच्‍चा भीतर ही रहा.

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